September 11, 2026

आम जनता की आवाज

सच का सारथी

“कोई लौटा दे… मेरे पटाखे” — बचपन की सादगी भरी दीपावली की यादें ताज़ा

Dukan Ad
Dukan Ad

“कोई लौटा दे… मेरे पटाखे” — बचपन की सादगी भरी दीपावली की यादें ताज़ा

चंपावत/लोहाघाट, संवाददाता।
बरसात के बाद पहाड़ का मौसम मानो नहा-धोकर नया जीवन पा लेता है। हरियाली का नया श्रृंगार, धुली-धुली सी धूप और दूर तक फैली दृश्यता मानो मन को सुकून देती है। नदियों-नालों का निर्मल जल और दिनभर दिखाई देते उज्ज्वल हिमालय — ये सब मिलकर पर्वतीय जीवन को और भी सुंदर बना देते हैं। इसी मनमोहक वातावरण के बीच दीपावली की जगमगाहट भी रंग भर रही है।

दीपों और बिजली की झालरों के साथ ही अब पटाखों का शोर भी गूंजने लगा है। लेकिन इसी चकाचौंध के बीच पाटन-पाटनी (लोहाघाट) के वरिष्ठ साहित्यकार भगवत प्रसाद पाण्डेय को याद आती है अपने बचपन की सादी-सहज दीपावली। वे कहते हैं— “अब की आतिशबाज़ी में रोशनी ज़्यादा है, लेकिन उजाला कम है।”

पाण्डेय बताते हैं कि बचपन में न पटाखों का इतना शोर होता था, न धुआँ। तब ‘मुर्गा छाप’ और ‘लक्ष्मी छाप’ पटाखे ही बड़े शौक से चलाए जाते थे। एक इंच का छोटा अनार भी एक मिनट तक जल जाए तो खुशी का ठिकाना न रहता था। फुलझड़ी की ‘चड़-चड़’ आवाज़ बच्चों के चेहरे पर हंसी बिखेर देती थी। रॉकेट मुश्किल से दस-बारह फीट ऊपर जाता, लेकिन उड़ते देख मन आसमान छू लेता था।

छोटे बच्चों के लिए रंगीन दिया-सलाई और काली टिकिया का अपना ही मज़ा होता था, जिससे जलने पर साँप-सा धुआँ निकलता। बारूद की छोटी बिंदियों से बनी खिलौना रिवॉल्वर की ‘पट-पट’ आवाज़ उन्हें फौजी बना देती थी। वहीं ‘चक्कर घिन्नी’ जब जलकर गोल-गोल घूमती, तो लगता जैसे वह भी खुशी से नाच रही हो।

अब दीपावली बदल चुकी है। मिट्टी के दीयों की जगह बिजली की मालाओं ने ले ली है, पर मन कहीं बुझा-सा लगता है। पहले फुलझड़ियों की रोशनी में चेहरे खिलते थे, अब तेज धमाकों में मुस्कानें डर जाती हैं।
पाण्डेय कहते हैं— “हम तब पटाखे जलाते थे, अब समय हमें जलाता है। इस प्रदूषण भरी आतिशबाज़ी के धुएँ से सिर्फ आँखें ही नहीं, सपने भी जलते हैं।”

वे wistfully कहते हैं— “काश! कोई लौटा दे वो बचपन वाली दीपावली, जहाँ रोशनी कम थी, लेकिन उजाला बहुत ज़्यादा था।”

 

शेयर करे