August 17, 2026

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बातों-बातों में :- *गौरा पर्व : सातूं-आठूं*

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बातों-बातों में :-

*गौरा पर्व : सातूं-आठूं*

पहाड़ की समृद्ध संस्कृति में हरे-भरे चातुर्मास के पर्व-उत्सव, मेलों-खेलों से पहाड़वासियों का बड़ा लगाव है। बिरुड़ पंचमी से दूर्वाष्टमी और उसके तीन-चार दिन बाद तक मनाया जाने वाला गौरा पर्व (सातूं-आठूं) महिलाओं को अधिक प्रिय है। यह लोक पर्व केवल पूजा-अनुष्ठान नहीं, बल्कि पहाड़ की पारिवारिक आस्था, लोकविश्वास और सामूहिक लोकजीवन से गहराई से जुड़ी हुई परंपरा है।

आम तौर पर सातूं-आठूं पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी और अष्टमी से मनाया जाता है। किसी वर्ष अगस्त्योदय की स्थिति जल्दी आने और कभी अधिकमास के प्रभाव के कारण इसकी तिथियों में अंतर भी देखने को मिलता है। वर्ष 2026 के पंचांग में शास्त्रसम्मत गणना के अनुसार बिरुड़ पंचमी 17 अगस्त, अमुक्ताभरण सप्तमी (सातूं) 19 अगस्त और दूर्वाष्टमी (आठूँ) 20 अगस्त 2026 को है।

एक तरह से बिरुड़ पंचमी से ही गौरा पर्व का श्रीगणेश हो जाता है। इस दिन सुबह महिलाएँ स्नान के बाद घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित कर इष्ट देवताओं को नमन करती हैं। फिर ताँबे या पीतल के पात्र के बाहर गोबर के ‘टीपके’ लगाकर उनमें एक-एक दूब का तिनका लगाया जाता है। पात्र पर अक्षत-पिठ्या लगाई जाती है और पिठ्या से स्वस्तिक बनाया जाता है। उसमें बिरुड़ भिगाने के लिए गेहूँ, सरसों, चना, लोबिया, कलूँ (मटर), उड़द (मास), सेम, गहत आदि में से पंचधान्य या सप्तधान्य लिए जाते हैं। इसी बर्तन के ऊपर एक अन्य छोटी-सी पोटली रखी जाती है, जिसमें सिक्का, सुपारी, कच्ची हल्दी का टुकड़ा, दो मुट्ठी अनाज और ऊपर की ओर दूब की गड्डी भी रखी जाती है। गंध-अक्षत चढ़ाकर दीप-बत्ती की जाती है।

अमुक्ताभरण सप्तमी (सातूं) के दिन माताएँ अपनी संतान की मंगलकामना के लिए व्रत रखती हैं और पूजा करती हैं। सुबह भिगोए गए बिरुड़ किसी नौले-धारे में ले जाकर सामूहिक रूप से धोए जाते हैं। अपराह्न में खेतों से लाई गई ‘सौं’ नाम की घास से पहले गौरा (पार्वती) की आकृति बनाई जाती है। उन्हें वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं और किसी देवालय, घर या सार्वजनिक स्थल में ससम्मान प्रतिष्ठित किया जाता है। पुरोहित द्वारा महिलाओं को एक समूह में बिठाकर विशेष पूजा कराई जाती है। तत्पश्चात अभिमंत्रित किए गए सप्तगाँठ लगे डोर ये महिलाएँ अपनी बाँह में बाँधती हैं।

इस पर्व की अष्टमी को दूर्वाष्टमी (आठूँ) कहा जाता है। दूर्वा (दूब) गणेश जी और देवी दुर्गा को प्रिय मानी जाती है। चूँकि दूब घास बार-बार अंकुरित होकर खूब फैलती है, इसलिए दूब सुख-समृद्धि, दीर्घायु और वंश-वृद्धि की प्रतीक भी मानी जाती है। इस दिन माताएँ अपने बच्चों और पति की दीर्घायु की कामना लेकर व्रत रखती हैं। पुनः सामूहिक रूप से बिरुड़ धोये जाते हैं। दिन में सौं घास से महेश्वर की आकृति बनाकर, उसे सजाकर गौरा की बगल में प्रतिष्ठित कर पूजा कराई जाती है। पोटली में रखे बिरुड़ गौरा जी को चढ़ाए जाते हैं। दूब-ज्योड़ को गले में धारण किया जाता है। बुजुर्गों से सुना है कि पहले केवल दूब से बनाए गए दूब-ज्योड़ गले में धारण करने की परंपरा थी। अब बाजार में मिलने वाले तागे के दूब-ज्योड़ पहने जाते हैं, जिनमें प्रतीक स्वरूप थोड़ी दूब भी लपेटी जाती है। पूजन के बाद शेष बिरुड़ प्रसाद के रूप में खाए और खिलाए जाते हैं। आठूँ के दिन अधिकतर महिलाएँ अग्नि पर पकाया भोजन नहीं करतीं। फलाहार, मेवे और अंकुरित बीज ग्रहण किए जाते हैं।

अंतिम दिन गौरा की विदाई यानी विसर्जन से पहले वहाँ चढ़ाए गए फल फटकने यानी आसमान की ओर उछालकर उन्हें प्रसाद स्वरूप लेने की रस्म होती है। इसके बाद गौरा-महेश्वर को विदा किया जाता है।

गौरा-महेश्वर का यह लोकपर्व शिव-पार्वती के प्रति श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है। इसमें गौरा-महेश्वर से जुड़े पारंपरिक लोकगीतों के सामूहिक गायन और नृत्य का सिलसिला चलता है। महिलाएँ मिलकर झोड़े आदि भी गाती हैं। कुछ स्थानों पर पुरुष और महिलाएँ आमने-सामने खड़े होकर सामूहिक गायन करते हैं। पिथौरागढ़ जिले में इस सामूहिक गायन को ‘खेल’ या ‘ठुल खेल’ भी कहा जाता है।
लगातार चार-पाँच दिनों तक चलने वाले इस पर्व में गीत, संगीत और नृत्य के माध्यम से पूरा वातावरण लोकमय हो जाता है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहता, बल्कि गाँव-समाज के लोगों के मिलने-जुलने और अपनी लोक संस्कृति को जीवंत रखने का अवसर भी बन जाता है।
सातूं-आठूँ की यही खूबसूरती है—इसमें पूजा है, व्रत है, संतान के मंगल की कामना है, पति की दीर्घायु की मनौती है। बिरुड़ का प्रसाद है, हरियाली है और सबसे बढ़कर लोकजीवन की वह सामूहिकता है, जो पहाड़ की संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखती आई है। गौरा पहाड़ की स्त्रियों की आस्था और अपनी लोकसंस्कृति से जुड़े रहने का भाव है।
■भगवत प्रसाद पाण्डेय
(लेखक: साहित्यकार और राजस्व विभाग के से.नि.अधिकारी हैं)

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