April 19, 2026

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वसंत पंचमी : विद्या, प्रकृति और संस्कृति का अनोखा संगम

वसंत पंचमी : विद्या, प्रकृति और संस्कृति का अनोखा संगम
चंपावत।
कल माँ सरस्वती का जन्मोत्सव, ऋतुराज वसंत का स्वागत

….पं.भगवत प्रसाद पाण्डेय (साहित्यकार व सेवानिवृत्त अधिकारी)
चंपावत ।

भारतीय संस्कृति पर्व-उत्सवों की धनी है। माघ शुक्ल पंचमी को विद्या देवी माँ सरस्वती का पूजन होता है। यही दिन वसंत ऋतु के आगमन की खुशखबरी भी लाता है। यह उल्लास, नवजीवन और सृजनशीलता का प्रतीक है।
माँ सरस्वती : ज्ञान और बुद्धि की अधिष्ठात्री माँ शारदा को विद्या, बुद्धि व वाणी की देवी माना जाता है। पुराणों में वर्णन है कि सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी के आह्वान पर आदिशक्ति से सरस्वती का अवतरण हुआ। श्वेत वस्त्र, वीणा-पुस्तक और हंस पर सवार माँ का स्वरूप पवित्रता व विवेक का प्रतीक है। वाल्मीकि से कालिदास तक सभी महापुरुषों की साधना में उनकी कृपा झलकती है।
प्रकृति का श्रृंगार और विविध मान्यताएँ
इस दिन प्रकृति फूलों से सजती है। सरसों के पीले फूल लहराते हैं, कोयल कूकती है। इसे श्री पंचमी, विद्या जयंती भी कहते हैं। प्राचीन काल में मदनोत्सव मनता था। बच्चे विद्यारंभ संस्कार करते हैं।
उत्तराखंड में खास परंपराएँ
पर्वतीय क्षेत्रों में पुरोहित जौ की हरियाली बांटते हैं। पीले फूल, हल्दी रंगी रुमाल, पतंग उड़ाना, कन्या भेदन जैसी रीतियाँ प्रचलित हैं। यज्ञोपवीत, चूड़ाकर्म व तीर्थ स्नान भी होते हैं। आधुनिक चुनौतियाँ और संकल्प गुरुकुल परंपरा अब बाजारी शिक्षा में बदल रही है। ऑनलाइन माध्यमों ने उत्सव की मस्ती कम की। फिर भी, वाणी संयम व सद्बुद्धि का संकल्प लें तो माँ प्रसन्न होंगी। वसंत पंचमी हमें सृजन की प्रेरणा दे।

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