April 24, 2026

आम जनता की आवाज

सच का सारथी

Dukan Ad
Dukan Ad

हौसले के धनी पूरन सिंह, एक हाथ से चलाते हैं ट्रैक्टर और करते हैं पशुपालन पलायन कर चुके युवाओं के लिए बन रहे प्रेरणा स्रोत

हौसले के धनी पूरन सिंह, एक हाथ से चलाते हैं ट्रैक्टर और करते हैं पशुपालन
पलायन कर चुके युवाओं के लिए बन रहे प्रेरणा स्रोत

चंपावत (सूवि)। आत्मनिर्भर उत्तराखंड की दिशा में जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार निरंतर आगे बढ़ रही है, वहीं ग्राम पंचायत बलाई के पूरन सिंह जैसे लोग इस पहल को जमीनी गति दे रहे हैं। पूरन सिंह ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने संकल्प, परिश्रम और आत्मविश्वास से यह साबित किया है कि हौसले बुलंद हों तो कोई भी कठिनाई विकास की राह नहीं रोक सकती।लोहाघाट विकासखंड के बलाई निवासी पूरन सिंह का जीवन संघर्ष और प्रेरणा दोनों का अद्भुत उदाहरण है। वर्ष 2009 में राजस्थान की एक कंपनी में कार्य करते समय हुए हादसे में उनका बायाँ हाथ कट गया, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय इस कठिनाई को चुनौती में बदल दिया।कोरोना काल के दौरान जब रोजगार के अवसर सीमित हुए, वह अपने पैतृक गांव लौट आए। गांव पहुंचकर उन्होंने कृषि और पशुपालन को अपनाया। आज वे खेती के साथ-साथ डेयरी उत्पादन कर रहे हैं। गाय और भैंसों से प्राप्त दूध से खोया और पनीर बनाकर वे स्थानीय बाजारों में बेचते हैं, जिससे उन्हें स्थायी आमदनी का स्रोत मिला है।पूरन सिंह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे एक हाथ से वे सभी कार्य दक्षता से करते हैं, जिनके लिए आमतौर पर दो हाथों की जरूरत होती है। उनका ट्रैक्टर उनके नवाचार और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है — उन्होंने उसकी सभी नियंत्रण व्यवस्था दाएं हाथ के अनुसार परिवर्तित की है। यहां तक कि ट्रैक्टर की मरम्मत भी वे खुद कर लेते हैं।खेती में वे आलू, गेहूं और मौसमी सब्जियां उत्पादन करते हैं तथा अपने हाथों से एक फलों का सुंदर बगीचा भी तैयार किया है। उनके इस प्रयास में उनकी पत्नी ममता का सहयोग और उत्साहवर्धन निरंतर बना रहता है। उनके दो पुत्र गुरुकुलम अकादमी में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।पूरन सिंह का कहना है कि युवाओं को शहरों की ओर पलायन करने के बजाय अपने गांव में ही अवसर तलाशने चाहिए। उनका संदेश है— “गांव की मिट्टी से जुड़ें, कृषि और पशुपालन को अपनाएं; पलायन नहीं, उत्पादन करें।”पूरन सिंह आज पूरे क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, साहस और स्वाभिमान के प्रतीक बन चुके हैं और उनका प्रेरक जीवन अनेक युवाओं को गांव की ओर लौटने की राह दिखा रहा है।

शेयर करे