April 24, 2026

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बातों-बातों में:ठंड आते ही मुस्कराए गुलदार

बातों-बातों में:ठंड आते ही मुस्कराए गुलदार

चम्पावत। ठंड की दस्तक के साथ ही जंगलों की खामोशी एक बार फिर दहाड़ में बदलने लगी है। जैसे ही पहाड़ों में सर्दी ने करवट ली, वैसे ही गांवों-कस्बों में गुलदारों की आमद की खबरें भी आने लगीं। हर साल की तरह इस बार भी गुलदारों का ‘शीतकालीन भ्रमण कार्यक्रम’ शुरू हो गया है।बरसात के बाद खेतों की फसल कट चुकी है, खेत सूने हैं और जंगलों की घनी झाड़ियां भी पतझड़ में अपने आप छँटने लगी हैं। ऐसे में जंगल के राजा यानी गुलदार कहाँ छिपें? ऊपर से हिरण, सुअर और सियार जैसे उनके शिकार भी अब गांवों और कस्बों की ओर निकल पड़ते हैं। यही वजह है कि गुलदारों की नजर अब लोगों के पालतू पशुओं—बकरियों, गायों और कुत्तों की तरफ़ जा टिकती है। कई बार तो इनका सामना राहगीरों या घर के आस-पास खेलते बच्चों से भी हो जाता है।सर्दियों की लंबी रातें गुलदारों के लिए सैर और शिकार का समय होती हैं। अंधेरे में धीरे-धीरे शिकार की तलाश करते ये मांसाहारी जीव भूख के चलते कभी-कभी दिनदहाड़े भी हमला कर देते हैं। वर्षाकाल में जन्मे इनके शावक अब इतने बड़े हो चुके हैं कि कदम से कदम मिलाकर चल सकें। स्वाभाविक है, उनकी रक्षा में मादा गुलदार किसी भी खतरे से भिड़ने को तत्पर रहती है।वन विभाग लगातार सतर्कता बरतने की अपील करता है— शाम के बाद जंगल की तरफ़ न जाएं, बच्चों को देर तक बाहर न खेलाएं और पशुओं के बाड़े के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद रखें। लेकिन केवल जनता ही नहीं, सड़क और निर्माण विभागों को भी सावधानी रखनी चाहिए। सड़क किनारे उगी ऊँची घास और झाड़ियां अब गुलदारों के लिए ‘वॉच टॉवर’ बन चुकी हैं। ऐसे में जरूरी है कि लोक निर्माण विभाग, एनएच, पीएमजीएसवाई, जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत अपने स्तर पर झाड़ी कटान अभियान चलाएं।नागरिकों को भी घरों के आस-पास की झाड़ियाँ और घास समय-समय पर साफ़ रखनी चाहिए। आखिर ठंड के मौसम में जब सभी को अपने घर की गर्माहट चाहिए, तो जंगल के इन मेहमानों को भी पेट भरने का हक़ तो है ही। बस इतना ध्यान रहे कि उनका ‘लंच या डिनर’ किसी गाँव के आँगन से न उठे।■ भगवत प्रसाद पाण्डेय
(साहित्यकार एवं सेवानिवृत्त राजस्व विभाग अधिकारी)

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