June 13, 2026

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गंगा द्वार पत्र बना पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक, गंगा दशहरा पर भगवत पाण्डेय ने दिया पर्यावरण जागरूकता का संदेश

*गंगा दशहरा पर लोहाघाट के भगवत पाण्डेय ने दिया पर्यावरण जागरूकता का अनोखा संदेश, गंगा द्वार पत्र बना पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक*

लोहाघाट (जनपद चम्पावत)।

पर्व और परंपराओं की भूमि उत्तराखंड में धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों, परम्पराओं को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का कार्य कुछ विरले ही कर पाते हैं। लोहाघाट के पाटन-पाटनी निवासी और राजस्व विभाग में सीएओ पद सेवा निवृत्त भगवत प्रसाद पाण्डेय ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अपनी विशिष्ट सोच और समर्पण से हर वर्ष गंगा दशहरा के अवसर पर तैयार किए जाने वाले गंगा द्वार पत्र को एक समसामयिक सामाजिक अभियान में बदल दिया है।

*पर्व, परंपरा और पर्यावरण — तीनों को जोड़ने वाली एक अद्भुत पहल*
गंगा दशहरा, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि जो इस बार 5 जून 2025 को पड़ रही है, महज एक धार्मिक तिथि नहीं है — यह वही दिन है, जब भारत सहित पूरी दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस भी मना रही है। इस दुर्लभ संयोग को भगवत पाण्डेय ने अपने रंगों से और भी गहरा कर दिया है। उन्होंने इस बार अपने हाथों से बनाए गंगा द्वार पत्र में ‘प्लास्टिक मुक्त विश्व’ की थीम को केंद्र में रखते हुए नदी संरक्षण, प्लास्टिक उन्मूलन और पर्यावरणीय चेतना का संदेश बड़े प्रभावी ढंग से दिया है।

*क्या होता है गंगा द्वार पत्र?*
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषकर गंगा दशहरा के दिन घरों के मुख्य द्वार पर एक विशेष द्वार पत्र चिपकाने की परंपरा है, जिसे ‘गंगा द्वार पत्र’ (दशार) कहा जाता है। इसमें ऋषियों की कीर्ति, गंगाजी से दश पाप हरने की स्तुति लिखी होती है। मान्यता है कि इसे लगाने से घर में वज्रपात, अग्निकांड, प्राकृतिक आपदाओं से बचाव होता है। यह धार्मिक परंपरा नदियों के प्रति स्वच्छता की जागरूकता केवल धार्मिक नहींकी प्रतीक भी है।

*प्लास्टिक से संकट में नदियाँ, चेताने को तैयार है पाण्डेय का पत्र*
भगवत पाण्डेय ने अपने इस वर्ष के द्वार पत्र यानी दशार को सिर्फ धार्मिक प्रतीक न बनाकर एक चेतावनी पत्र का रूप दे दिया है। उन्होंने इसमें दर्शाया है कि किस प्रकार गंगा, यमुना, सरयू और काली जैसी नदियाँ आज प्लास्टिक, केमिकल्स और मानवजनित कचरे से दम तोड़ रही हैं।
उनका कहना है,“गंगा माँ का अवतरण धरती पर केवल पापहरण के लिए नहीं हुआ, बल्कि यह हमें शुद्धता, पवित्रता और जीवनदायिनी प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी की याद दिलाने के लिए है। जब हम गंगा की पूजा करते हैं, तो हमें उसके शरीर यानी जलधारा को भी निर्मल और स्वच्छ रखना चाहिए।”

*स्थानीय जनमानस में मिली गूंज*
भगवत पाण्डेय के बनाए द्वार पत्रों को क्षेत्रीय लोग घर-घर में श्रद्धा से लगाते है। इस वर्ष जब लोगों ने देखा कि द्वार पत्र (दशार) में व्यक्त पहाड़ के साफ-स्वच्छ पर्यावरण को ‘प्लास्टिक से मुक्ति ही सच्ची आराधना है’ आह्वान छपा है, तो यह सभी के मन को छू गया।
वही उनके बनाये गये द्वार पत्र अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन जैसे देश में उनके परिचित एवं रिश्तेदारों द्वारा प्रिंट निकाल कर लगाये जाते हैं।

*एक व्यक्ति, एक विचार — पर समाज को झकझोर देने वाली अपील*

भगवत प्रसाद पाण्डे ज़िला अधिकारी कार्यालय चम्पावत से प्रभारी अधिकारी रहते हुए सेवानिवृत्त हुए थे।वर्षों से वे हर गंगा दशहरा पर खुद अपने हाथों से द्वार पत्र बनाते आ रहे हैं और हर बार इसमें एक नया समय-सापेक्ष विषय चुनते हैं — कभी बेटी बचाओ, कभी जल संरक्षण, कभी कोरोना से बचाव, कोली झील का सौन्दर्य तो कभी वृक्षारोपण।
इस बार उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और विशेषकर नदी स्वच्छता को गंगा आराधना से जोड़कर एक नई दिशा दी है। उनका मानना है कि अगर पर्वों को केवल कर्मकांड बनाकर छोड़ दिया जाए, तो वे समय के साथ अर्थहीन हो जाते हैं। लेकिन जब हम उनमें समाज के प्रति जिम्मेदारी और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को जोड़ते हैं, तब वे जिंदा परंपराएँ बनती हैं।

*निष्कर्ष: एक छोटी-सी पहल, लेकिन बड़ी प्रेरणा*

आज जब गंगा जैसे पवित्र नदियों की हालत चिंताजनक है, और जब धार्मिक आयोजन भी प्लास्टिक कचरे से पट जाते हैं, ऐसे समय में भगवत पाण्डेय का यह सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समन्वय एक मिसाल है।
गांव की गलियों से उठी यह आवाज पूरे प्रदेश और देश के लिए एक संदेश है —
“सिर्फ पूजन से नहीं, संरक्षण से ही होगी गंगा माँ की सच्ची सेवा!”

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