बातों-बातों में:सदी की चवन्नी पूरी –
लोहाघाट।
वक्त जैसे पंख लगाकर उड़ गयाअब सोचिए, मानो कल ही की बात हो—जब कैलेंडर ने इक्कीसवीं सदी के पहले साल का पन्ना खोला था। याद है 1 जनवरी 2001 की वह नई सुबह, जब अख़बारों की सुर्खियों में “नई सदी” छाई हुई थी।
तब किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि देखते-देखते इन पच्चीस वर्षों की चवन्नी कब पूरी हो जाएगी। सच कहें तो यह एक ऐसा सफ़र रहा, जो न जाने कब हथेली से रेत की तरह फिसल गया।इन पच्चीस वर्षों की रफ़्तार पर अगर नज़र डालें, तो लगता है जैसे समय एक चलती ट्रेन की तरह भागता रहा—हम खिड़की से बाहर झाँकते रहे, और ज़िंदगी पटरी पर दौड़ती गई। जिन बच्चों ने सदी के आरंभ में पहली बार आँखें खोली थीं, वे आज ज़िम्मेदारियों की कतार में खड़े मेहनतकश युवा हैं। जो तब युवा थे, वे आज अधेड़पन की दहलीज़ पर हैं—कुछ दादा-दादी बनकर अपने अनुभवों की कहानियाँ आगे बाँट रहे हैं।इस चवन्नी में सिर्फ तकनीक नहीं, ज़िंदगी की परिभाषाएँ बदलीं। रिश्तों की भाषा बदली, संवाद के तरीके बदले। हमने बहुत कुछ पाया—तेज़ रफ़्तार, सुविधाएँ, असीम जानकारी—पर इसी दौड़ में बहुत कुछ पीछे छूट गया। वो अपनापन, वो ठहराव, वो फुर्सत के पल अब दुर्लभ हो चले हैं।हर साल ने हमें कुछ न कुछ सिखाया—कभी मुस्कान दी, कभी बिछड़न का एहसास, कभी किसी अधूरे सपने की टीस। किसी का बचपन छूट गया, किसी की जवानी ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दब गई, और कोई अपनों को खोकर अचानक “बड़ा” हो गया।अब जब 2025 अपनी गठरी समेटने को तैयार है, तो लगता है जैसे यह साल भी जाते-जाते बहुत-सी यादें और कुछ अधूरे अरमान सौंपकर विदा लेगा। सामने 2026 खड़ा है—एक कोरी कॉपी की तरह, जिसके पन्नों पर अब तक कुछ लिखा नहीं गया। ये हमसे बस एक सवाल पूछता है—
“इस बार क्या लिखोगे?”समय रुकता नहीं, पर हम ठहर सकते हैं—एक पल को पीछे मुड़कर देखने के लिए, फिर आगे बढ़ने के नए संकल्प के साथ। पिछले साल के वादों को याद करें, अपूर्ण सपनों को पूरा करने का हौसला जुटाएँ। आने वाले वर्ष में समय को दोष देने के बजाय हर क्षण का आभार मानें।क्योंकि घड़ी की सुइयाँ चाहे कितनी भी तेज़ दौड़ें, यादों में वही पल ठहरते हैं जिन्हें हमने पूरे दिल से जिया होता है।
नए साल का संकल्प यही हो—समय के पीछे नहीं, उसके साथ चलना सीखें।■ भगवत प्रसाद पाण्डेय
(लेखक साहित्यकार और सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)
बातों-बातों में:सदी की चवन्नी पूरी

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