संविधान दिवस पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी: बातों-बातों में हम भारत के लोग…
चंपावत।
देशवासियों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है 26 नवंबर, जब वर्ष 1949 में संविधान सभा ने भारत का संविधान अपनाया। यह वह दिन है जिसने भारत को अधिकारों और कर्तव्यों की एक प्रणाली दी, जिसके आधार पर लोकतंत्र और कानून-कानून व्यवस्था खड़ी हुई। लेकिन यह भी सत्य है कि हम “हम भारत के लोग…” की आवाज़ के साथ शपथ तो लेते हैं, पर व्यवहार में संविधान की आत्मा को चोट पहुँचाते हैं।
बातों-बातों में हम सब बड़े-बड़े आदर्शों की चर्चा करते हैं, जबकि असलियत में उनके अनुरूप कदम उठाने से कतराते हैं।हम सब बराबरी के कानून की बात तो करते हैं, पर जब नियमों की तलवार हमारी ओर आती है, तो छूट की मांग करने लगते हैं। लोकतंत्र की मजबूती का सपना देखते हैं, मगर ईमानदारी, जवाबदेही और अनुशासन से दूर रहते हैं। भ्रष्टाचार को पाप मानते हैं, पर ‘‘थोड़ा बहुत चलता है’’ जैसी सोच को स्वीकार भी कर लेते हैं। यातायात नियमों का ज्ञान हम रखते हैं, पर पालन की ओर लापरवाही दिखाते हैं।हम कतार का ज्ञान दूसरों को देते हैं, पर खुद ‘विशिष्ट’ होने के लालच में उस कतार को तोड़ देते हैं। गंदगी को अपने मौलिक अधिकार में बदल देते हैं, जबकि साफ-सफाई पर भाषण देने में पीछे नहीं रहते। नेता चुनते हैं जो बड़े दावे करते हैं, पर समस्याओं का समाधान नहीं करते। यह विडंबना है कि हम आदर्शों की बातें करते हैं पर अपनी आलोचना से कतराते हैं।संविधान दिवस एक दर्पण की तरह है, जिसमें हमें अपनी कमियों और उपलब्धियों दोनों को देखना चाहिए। परंतु दुख की बात है कि हम इस दर्पण को घुमा कर दीवार की ओर करते हैं और देश को बचाने की बातों में व्यस्त हो जाते हैं, जबकि असल में रोज़ अपनी आदतों से संविधान और देश को कमजोर कर रहे हैं।इस संविधान दिवस पर यह विचार करना जरुरी है कि “हम भारत के लोग” अपने आदर्शों को सही माने और अपनी जीवन शैली में बदलाव लाएं। यदि “बातों-बातों में” इतना ही देश बदल पाते, तो यह व्यंग्य शायद आज लिखने की जरूरत न पड़ती।
— भगवत प्रसाद पाण्डेय, से.नि. सीएओ, राजस्व विभाग एवं साहित्यकार

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