April 24, 2026

आम जनता की आवाज

सच का सारथी

Dukan Ad
Dukan Ad

गौलज्यू नहीं, गोरल देव कॉरीडोर स्थानीय इतिहास और परंपरा का सम्मान—कॉरीडोर का नाम मूल स्वरूप में ही रखा जाए

बातें-बातों में: गौलज्यू नहीं, गोरल देव कॉरीडोर
स्थानीय इतिहास और परंपरा का सम्मान—कॉरीडोर का नाम मूल स्वरूप में ही रखा जाए
भगवत प्रसाद पाण्डेय
(पूर्व सीएओ, राजस्व विभाग एवं साहित्यकार)चंपावत। न्याय के लोकदेवता के रूप में प्रतिष्ठित गोरल देव की पूजा न केवल उत्तराखंड में, बल्कि नेपाल के सीमावर्ती गांवों में भी आस्था और विश्वास के साथ की जाती है। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो काली नदी के उस पार स्थित डोटी क्षेत्र कभी कुमाऊं के अधीन रहा है। लोकश्रुति के अनुसार यहाँ का शासन धौली–धुमाकोट के झालराई नामक मांडलिक राजा के अधीन था।किवदंती है कि उनकी सात रानियाँ थीं। इनमें रानी कालींगा जब गर्भवती हुईं, तो अन्य रानियों में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। उन्होंने षड्यंत्र रचकर नवजात को जन्म के समय पत्थर की सिल से ढक दिया और उसे संदूक में बंद कर बहा दिया। किंतु देवयोग से शिशु जीवित बच गया और वही बालक आगे चलकर गोरल देव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनकी न्यायप्रियता और लोकहित के कार्यों के कारण वो पूरे कुमाऊं में न्याय के देवता के रूप में पूजे जाने लगे।इन दिनों चंपावत मुख्यालय में करोड़ों रुपये की लागत से प्रस्तावित ‘गौलज्यू कॉरीडोर’ को लेकर चर्चाएँ तेज हैं। स्थानीय इतिहासकारों और जनप्रतिनिधियों का मत है कि चंपावत गोरल देव की मूल स्थली है, इसलिए इस भव्य परियोजना का नाम “गोरल देव कॉरीडोर” रखा जाना चाहिए।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा कई शहरों और स्थलों के मूल नाम पुनर्स्थापित किए जाने के बाद, उत्तराखंड प्रशासन को भी चंपावत में बन रहे इस कॉरीडोर का नाम स्थानीय परंपरा और बोली के अनुसार ही निर्धारित करना चाहिए। स्थानीय बोली कुमय्या में इस देवता का मूल नाम गोरल ही रहा है।
चंपावत में उनके मंदिर को गोरल का थान तथा परिसर को गोरलचौड़ नाम से जाना जाता है।इसी क्रम में स्थानीय शिक्षाविद डॉ. कीर्ती बल्लभ शक्टा और इतिहासलेखक देवेन्द्र ओली का भी मत है कि चंपावत में बन रहा कॉरीडोर “गोरल देव कॉरीडोर” ही कहलाना चाहिए। उनका कहना है कि “गौलज्यू” नाम अल्मोड़ा के चितई और नैनीताल के घोड़ाखाल मंदिरों में प्रचलित है, परंतु चंपावत में सदियों से गोरल देव नाम ही लोकमानस के केंद्र में रहा है।स्थानीय लोगों का भी मत है कि मूल नाम में परिवर्तन से परंपरा और सांस्कृतिक अस्मिता दोनों को ठेस पहुंचेगी। अतः प्रशासन को इस विषय में संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेना चाहिए ताकि ‘गोरल देव कॉरीडोर’ कुमाऊं के इतिहास और आस्था दोनों का प्रतीक बन सके।

शेयर करे