काश! कोई और लाश इस तरह डंडे पर लटककर न जाए…
चंपावत।
ये झकझोर देने वाली तस्वीर चम्पावत जिले की है। सिस्टम की दुर्दशा ऐसी कि 65 साल के रुईयां निवासी संतोष सिंह का बचपन, जवानी और बुढ़ापा सड़क के इंतजार में कट गया। जब मौत आई तो तिरपाल के टुकड़े में लाश को लपेटकर सिंगल डंडे के सहारे 12 किलोमीटर पैदल ले जाना पड़ा। बताया जा रहा है कि संतोष बीमार थे उन्हें चंपावत इलाज के लिए लाया गया था लेकिन उन्होंने रास्ते मे ही दम तोड़ दिया।
मानसून के सीजन में प्राकृतिक आपदा के साथ सिस्टम की त्रासदी का इस जिले ने खूब दंश झेल लिया है।
ये कोई नई तस्वीर नहीं है जिससे चौंका जा सके। इसके जैसे कई गांव के लोगों ने सुविधाओं के अभाव, सिस्टम की अनदेखी और नेताओं के मक्कारी के कारण दम तोड़ दिया। वोटिंग के दौरान जीतोड़ मेहनत करके डोली से बूथ तक इन मासूम मतदाताओं को लाने वाले नेता आज कहां हैं? क्या वे इस तस्वीर को देख रहे होंगे…? अगर देख रहे होंगे तो शर्म भी आ ही रही होगी। न जाने बुजुर्ग संतोष सिंह जैसी कितनी लाशें डंडे पर घाट तक जाएंगे। ये सिर्फ बुजुर्ग की नहीं उस सिस्टम की भी अर्थी है, जो इस चकाचौंध भरे आधुनिक दौर में गांव को सड़क या अन्य बुनियादी सुविधाओं से नहीं जोड़ सके। बस उम्मीद यही कि काश! कोई और लाश फिर डंडे पर लटकती हुई न जाए।
लंबे समय से लोग सड़क की मांग कर रहे हैं लेकिन वन भूमि के कारण गांव में सड़क नहीं बन पा रही है।

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