September 7, 2026

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कुमाऊँनी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के प्रयासों को नई दिल्ली में मिली सराहना

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चम्पावत के भाषा शिक्षकों का दिल्ली में सम्मान

कुमाऊँनी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के प्रयासों को नई दिल्ली में मिली सराहना

नई दिल्ली। कुमाऊँनी भाषा के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी को लोकभाषा व संस्कृति से जोड़ने की दिशा में चम्पावत जिले में किए जा रहे प्रयासों को राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह-2026 में सराहना मिली। नई दिल्ली के संसद मार्ग स्थित एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में आयोजित समारोह में चम्पावत और अल्मोड़ा से पहुंचे भाषा शिक्षकों एवं भाषा सेवकों को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

समारोह के मुख्य अतिथि उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी रहे। उन्होंने लोकभाषाओं के संरक्षण को संस्कृति, परंपरा और अपनी जड़ों को सुरक्षित रखने से जोड़ते हुए भाषा शिक्षकों और कार्यकर्ताओं के प्रयासों की सराहना की।

कोश्यारी ने विशेष रूप से चम्पावत जैसे सीमांत और दूरस्थ जिले में विद्यालय स्तर पर संचालित कुमाऊँनी भाषा शिक्षण केंद्रों एवं कक्षाओं की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों और भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद जिस समर्पण के साथ भाषा शिक्षण का कार्य किया जा रहा है, वह अनुकरणीय है।

विद्यालयों में चल रही कुमाऊँनी भाषा की कक्षाएं

चम्पावत जिले के विभिन्न विद्यालयों में भाषा संरक्षण अभियान के तहत कुमाऊँनी भाषा की कक्षाएं संचालित की जा रही हैं। इनमें विद्यार्थियों को भाषा के साथ लोकगीत, लोककथाओं, लोकसाहित्य, पारंपरिक शब्दावली, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से भी परिचित कराया जा रहा है।

भाषा शिक्षकों के अनुसार इस पहल का उद्देश्य बच्चों को अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना तथा कुमाऊँनी को विद्यालय स्तर पर जीवंत एवं व्यवहारिक बनाए रखना है। उनका कहना है कि लोकभाषा में समाज की लोकस्मृतियां, कहावतें, गीत और पीढ़ियों का अनुभव सुरक्षित रहता है, इसलिए इसके संरक्षण की जिम्मेदारी सामूहिक है।

कुमाऊँनी, गढ़वाली और जौनसारी के संरक्षण पर जोर

कार्यक्रम का आयोजन उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली और दिल्ली पैरामेडिकल एंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (DPMI) के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। मंच की ओर से उत्तराखंड की प्रमुख लोकभाषाओं कुमाऊँनी, गढ़वाली और जौनसारी के संरक्षण, संवर्धन एवं शिक्षण के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं।

इसी अभियान के तहत विद्यालयों में भाषा शिक्षण केंद्रों को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि नई पीढ़ी अपनी लोकभाषा को पढ़ने, लिखने और बोलने के साथ उससे जुड़ी संस्कृति को भी समझ सके।

इन भाषा सेवकों को मिला सम्मान

समारोह में चम्पावत और अल्मोड़ा से पहुंचे भूपेंद्र सिंह देव ‘ताऊजी’, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी; जनार्दन चिल्कोटी, आरसेटी के पूर्व निदेशक एवं जिला संयोजक, कुमाऊँनी भाषा-साहित्य प्रचार समिति; सतीश जोशी, ऋतेश कुमार वर्मा, जनार्दन प्रसाद गड़कोटी, गौरव बंसल, नितिन देव, तुलसी भट्ट, जीवन तिवारी, पुष्पा पाटनी, सीमा जोशी, तुलसी बिष्ट, हेमा बिष्ट, ममता बिष्ट एवं कृपाल सिंह शीला को सम्मान-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

सम्मान समारोह में इन भाषा शिक्षकों एवं सेवकों द्वारा कुमाऊँनी भाषा के प्रचार-प्रसार और नई पीढ़ी को लोकसंस्कृति से जोड़ने के लिए किए जा रहे प्रयासों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया।

चम्पावत के लिए गौरव का क्षण

नई दिल्ली के राष्ट्रीय मंच पर चम्पावत के भाषा शिक्षकों एवं भाषा सेवकों को मिला सम्मान पूरे जिले के लिए गौरव का विषय है। विद्यालयों के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों तक कुमाऊँनी भाषा की कक्षाएं पहुंचाना लोकभाषा संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

आयोजकों ने कहा कि लोकभाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज के इतिहास, लोकस्मृति, परंपरा, संस्कृति और सामूहिक पहचान की जीवंत धरोहर हैं। इनके संरक्षण के लिए विद्यालय, परिवार और समाज को मिलकर प्रयास करने होंगे।

चम्पावत और अल्मोड़ा के भाषा शिक्षकों के प्रयासों की राष्ट्रीय मंच पर हुई सराहना को लोकभाषा संरक्षण अभियान के लिए उत्साहवर्धक बताया गया। भाषा सेवकों का मानना है कि यह सम्मान चम्पावत में चल रहे भाषा संरक्षण अभियान को नई ऊर्जा देगा और आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा एवं सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में मदद करेगा।

“भाषा केवल शब्द नहीं, हमारी पहचान है। लोकभाषा बचेगी तो लोकसंस्कृति, लोकस्मृति और हमारी जड़ें भी सुरक्षित रहेंगी।”

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